जनवरी 14, 2012

बंद कमरे का पुराना सामान..

नए मौसम में एक पुरानी पेशकश:


कभी फुर्सत में बैठो
तो खोलना बरसों से बंद पड़ा वह कमरा
जहां यूं ही बेतरतीब बिखरा हैं
कुछ पुराना सामान।

किसी आले पर पड़ा होगा
एक पुराना अल्बम
मन करे तो देखना
कि मेरी उजली हंसी में घुलकर
तुम्हारी सुरमई शाम
कैसे गुलाबी हो जाती थी।
कि पस-ए-मंज़र में वो आसमानी रंग
मेरी उमंगों का था।
एक ही फ्रेम में कैद होंगी
तुम्हारी खामोशियां, मेरी गुस्ताखियां
और क्लोज-अप में होंगे हमारे साझे सपने।
कैद होंगे कहीं सावन के किस्से
जब बारिशों के बाद की धूप में
तुमने समझाया था मुझे
इंद्रधनुष का मतलब।

अलगनी पर टंगा होगा एक पुराना कोट
जिसकी आस्तीन से चिपके होंगे कुछ ख्वाब
और एक जेब में पड़े होंगे कुछ खुदरा लम्हे
देखना क्या उनकी खनक आज भी वैसी ही है।
एक जेब में शायद पड़ी मिले
मेरी हथेलियों की गरमाहट
जो चुराई थी मैंने तुम्हारे ही हाथों से
और एक मासूम से जुर्म की सजा में
उम्र कैद पाई थी।

पन्‍ना दर पन्‍ना खोलना
माज़ी की हसीन किताब
कि सलवटों में पड़े सूखे फूलों में
महक अभी बाकी होगी।
हवाओं ने जिसे इधर धकेला था,
वह आवारा बादल का टुकड़ा
लौट कर नहीं गया।
जब नए मौसम की सर्द हवा
खुश्क कर दे तुम्हारे ज़ज्बात
चुपके से खोलना यह बंद कमरा
कि पिछले मौसमों से बचा-बचा कर
थोड़े एहसास रखे हैं तुम्हारे लिए।

अलमारी के निचले खाने में
होगा एक पीला दुपट्टा।
जब सुनाई दे तुम्हें,
वसंत के जाते हुए कदमों की उदास आहट
आहिस्ते से खोलना वह दुपट्टा
कि उसकी हर तह में
जाने कितने वसंत कैद हैं।
रफ्ता रफ्ता खुलती हर तह के साथ
तुम देखोगे सुर्ख गुलमोहर में लिपटे
सकुचाए वसंत के लौटते निशां
जैसे गौने में
किसी नवेली के महावर लगे पांव
करते हैं गृहप्रवेश।

यहां से पिछली दीवाली
मैंने बुहार दिया था दर्द का हर तिनका।
उतार दिए थे सब जाले।
और यूं ही पड़ा रहने दिया था
सारा साजो-सामान।
तन्हा नहीं होने देगा तुम्हें
मेरे जाने के बाद,
बंद कमरे का यह पुराना सामान....

40 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर...
    दिल चाहता ही है..यादों को संजोये रखना..

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  2. बहुत सुन्दर रचना ..!
    बहुत कोमल एहसास भरें है !
    आभार !

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  3. एक जेब में शायद पड़ी मिले
    मेरी हथेलियों की गरमाहट
    जो चुराई थी मैंने तुम्हारे ही हाथों से
    और एक मासूम से जुर्म की सजा में
    उम्र कैद पाई थी।

    बहुत संवेदनशील भावनात्मक प्रस्तुति. बधाई.

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  4. नवीन बिम्बों का सुंदर प्रयोग कविता के भाव को द्विगुणित कर रहा है।

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  5. कल 17/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. यहां से पिछली दीवाली
    मैंने बुहार दिया था दर्द का हर तिनका।
    उतार दिए थे सब जाले।
    और यूं ही पड़ा रहने दिया था
    सारा साजो-सामान।
    तन्हा नहीं होने देगा तुम्हें
    मेरे जाने के बाद,

    बंद कमरे का यह पुराना सामान....|



    यादों को याद दिलाया हैं इन शब्दों से
    दर्द भी कहाँ छुपा हैं इन शब्दों से .....
    वाह बहुत खूब.. उम्दा
    मैं आपको मेरे ब्लॉग पर सादर आमन्त्रित करता हूँ.....

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  7. तन्हा नहीं होने देगा तुम्हें
    मेरे जाने के बाद,
    बंद कमरे का यह पुराना सामान....bahut achchi prastuti.

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  8. "और एक जेब में पड़े होंगे कुछ खुदरा लम्हे
    देखना क्या उनकी खनक आज भी वैसी ही है"
    अति सुन्दर पक्तियां ,

    वाह बहुत उम्दा सुंदर प्रस्तुति आपकी रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद शुभकामनायें

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  9. तन्हा नहीं होने देगा तुम्हें
    मेरे जाने के बाद,
    बंद कमरे का यह पुराना सामान....
    बिल्‍कुल सच कहा है आपने प्रत्‍येक पंक्ति में ..आभार इस बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये ।

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  10. बंद कमरे ने बहुत सा सामान समेटा हुआ है .. एक दुप्पटे में न जाने कितने बसंत छिपे हैं .. बहुत पसंद आई यह रचना ..

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  11. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  12. बेहतरीन कविता। वाह! अब आज और कुछ न पढ़ा जायेगा..इसी अहसास के साथ रहना है।

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  13. आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ..और जो पहली रचना पढ़ने को मिली, वो ये थी। हर शब्द, हर वाक्य के साथ एक चित्र उभरता गया मन में... बहुत उम्दा रचना!!

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  14. अहसासों से भरी बहुत सुंदर रचना ,बेहतरीन प्रस्तुति. आपके पोस्ट पर आना सार्थक रहा समर्थक बन गया हूँ आप भी बने मुझे खुशी होगी,...
    welcome to new post...वाह रे मंहगाई

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  15. मैंने बुहार दिया था दर्द का हर तिनका।
    उतार दिए थे सब जाले।
    और यूं ही पड़ा रहने दिया था
    सारा साजो-सामान।
    तन्हा नहीं होने देगा तुम्हें
    मेरे जाने के बाद,
    ये नाजुक से अहसास ...बहुत बढि़या प्रस्‍तुति ।

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  16. खुदरा लम्हे...!!

    वसंत के जाते हुए कदमों की उदास आहट
    आहिस्ते से खोलना वह दुपट्टा
    कि उसकी हर तह में
    जाने कितने वसंत कैद हैं।

    मुरीद हो गए भई आपके ...

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  17. बहुत अच्छी रचना ....
    हालाँकि गुलजार जी की एक रचना से मिलती जुलती है ...
    पर आपने अपने तरीके से इसे अनोखा रूप दिया है
    निश्चित रूप से इस खनक की आवाज़ को सुनने बार बार आना पड़ेगा .....:))

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  18. मन करे तो देखना
    कि मेरी उजली हंसी में घुलकर
    तुम्हारी सुरमई शाम
    कैसे गुलाबी हो जाती थी।
    कि पस-ए-मंज़र में वो आसमानी रंग
    मेरी उमंगों का था।
    एक ही फ्रेम में कैद होंगी
    तुम्हारी खामोशियां, मेरी गुस्ताखियां
    और क्लोज-अप में होंगे हमारे साझे सपने।
    ...
    जो अब साझे नहीं रहे !!!

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  19. और एक जेब में पड़े होंगे कुछ खुदरा लम्हे
    देखना क्या उनकी खनक आज भी वैसी ही है।

    बहुत गहरे भाव ,बहुत सुन्दर

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  20. सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति.
    please visit my blog.

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  21. पन्‍ना दर पन्‍ना खोलना
    माज़ी की हसीन किताब
    कि सलवटों में पड़े सूखे फूलों में
    महक अभी बाकी होगी।
    हवाओं ने जिसे इधर धकेला था,
    वह आवारा बादल का टुकड़ा
    लौट कर नहीं गया।
    ...sach aawara badal ka koi thikana nahi...gahan anubhuti se saji rachna...
    ..band kamre mein jaane kitni hi yaadon ki pitara ata pada rahta hai, jab khulta hai to yun hi jaane kitni hi yaad sameta rahta hai...

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  22. हृदयस्पर्शी शब्द ....बेहतरीन पंक्तियाँ

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  23. बहुत सुंदर प्रस्तुति,भावपूर्ण अच्छी रचना,..
    WELCOME TO NEW POST --26 जनवरी आया है....
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

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  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  25. इतनी सुंदर कविता पढ़ने के बाद क्या कहूँ..

    (कभी फुर्सत में...)

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  26. लाजवाब....मर्म स्पर्शी ह्रदय स्पर्शी

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