मई 12, 2012

औरत जब बनती है मां

मां तो हमेशा मां होती है, फिर उसके लिए मदर्ड डे के नाम पर एक दिन क्यों? इससे बेहतर कि हम उसे वह सम्मान दें जिसकी वह असली हकदार है। आज अपनी एक साल पुरानी एक कविता यहां शेयर कर रही हूं.......
 
चाहे न हो उसे,
पोथियों का ज्ञान।
उठने-बैठने,
बोलने, हंसने के सलीके
से हो अनजान।
पर सीख लेती है,
क्षण भर में एक जुबां
औरत जब बनती है मां।

उसका हंसना-रोना,
सब पहचानती है।
वह मां है,
हर बात जानती है।
उसकी एक आवाज पर भागती है,
मां उसकी आंखों से,
सोती है, जागती है।

जिन डगमग पांवों को,
वह चलना सिखाती है।
जब वे दौड़ जाते हैं,
वह पीछे रह जाती है।
उसे नहीं आती अंग्रेजी,
उनके दोस्तों में मिक्स-अप होना।
वह नहीं जानती,
कि एंबेरेसिंग होता है,
सब के सामने हंसना-रोना।

जब होते हैं बाल सफेद,
ज़िंदगी की धूप में।
आधुनिकता की डाई से
बच्चे रंगना चाहते हैं,
उसे नए रूप में।
जिनकी मूक भाषा भी,
कभी झट से समझती है।
आज उनकी बोली
अजनबी सी लगती हैं

अब अपनी परवाह
खुद कर सकते हैं बच्चे
ज़िंदगी से जूझ सकते,
लड़ सकते हैं बच्चे।
अंधेरे कमरे में
अपनी चारपाई पर पड़ी है
मां जो फिर से औरत बन गई है।

38 टिप्‍पणियां:

  1. जिन डगमग पांवों को,
    वह चलना सिखाती है।
    जब वे दौड़ जाते हैं,
    वह पीछे रह जाती है।

    सुंदर भावपुर्ण रचना .......
    चार पंक्तियाँ माँ के सम्मान में ,...

    माँ की ममता का कोई पर्याय हो नहीं सकता
    पूरी दुनिया में माँ तेरे जैसा कोई हो नही सकता
    माँ तेरे चरण छूकर सलाम करता हूँ
    सभी माताओ को प्रणाम करता हूँ..

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  2. उसका हंसना-रोना,
    सब पहचानती है।
    वह मां है,
    हर बात जानती है।
    उसकी एक आवाज पर भागती है,
    मां उसकी आंखों से,
    सोती है, जागती है।
    बहुत ही सुन्दर कविता |

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  3. माँ के लिए पूरी ज़िन्दगी भी कम हैं...मदर्स-डे बाज़ार का हिस्सा है !

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  4. माँ फिर से औरत नहीं बनती..नहीं..कभी नहीं।

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  5. दिल को छू गयी ये रचना...........
    जाने कौन माटी की बनी होती है माँ......

    सस्नेह.

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  6. बहुत अच्छी रचना। एक दिन का मदर्स डे उनके लिये जिन्हें इसके बिना एक दिन भी याद नहीं रहता, वैसे मानने वाले रोज़ ही मदर्स डे मनाते हैं! :)

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  7. बड़ी प्यारी कविता है...
    माँ तो बस माँ होती है और हर माँ की एक ही जुबान होती है...स्नेह पगी

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  8. सही कहा आपने...माँ के लिये तो पूरी जिन्दगी कम है फिर एक दिन क्यों?

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  9. माँ बनने के बाद एक औरत सिर्फ माँ रहती है, क्योंकि एक आरम्भ उसके अन्दर होता है पूरी प्रकृति लिए

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  10. चाहे न हो उसे,
    पोथियों का ज्ञान।
    उठने-बैठने,
    बोलने, हंसने के सलीके
    से हो अनजान।
    पर सीख लेती है,
    क्षण भर में एक जुबां
    औरत जब बनती है मां।
    each and every word is precious than diamond.beautiful lines.

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  11. जब वे दौड़ जाते हैं,
    वह पीछे रह जाती है।

    माँ तो बस माँ होती है

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  12. अंधेरे कमरे में
    अपनी चारपाई पर पड़ी है
    मां जो फिर से औरत बन गई है।

    बहुत संवेदनशील और सुंदर कविता. शेयर करने के लिये धन्यबाद.

    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  13. बहुत खूब ....
    शुभकामनायें हर माँ के लिए

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  14. beautifully written a meaningful poetry which defines the journey of a mother.
    unique relation in universe we call it mother.thanks

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  15. मदर्स डे को समर्पित इस रचना ने मन छू लिया।
    विश्व की हर मां को नमन।

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  16. बहुत सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  17. आपकी कविताओं में गहराई और उत्तम विचार हैं.

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  18. बच्चे जब बड़े हो जाते तब माँ फिर से ऑरत हो जाती है !
    व्यथा मैंने भी लिखी अपनी कविता में !

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  19. जिनकी मूक भाषा भी,
    कभी झट से समझती है।
    आज उनकी बोली
    अजनबी सी लगती हैं

    मां को समर्पित एक श्रेठ रचना।

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  20. मैं हूँ पंछी तो मेरा पर है माँ
    हर समय मुझमे अग्रसर है माँ ...........बहुत सुंदर मनोभावों को शब्दों का जामा पहनाया है आपने !

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  21. पौष-माघ की ठिठुरन में है गरम रजाई माँ
    तपती जेठ दुपहरी में शीतल अमराई माँ ।
    ............
    स्वार्थ नही सन्देह नही बस नेह भरा विश्वास
    झूठे रिश्तों की दुनिया में एक सच्चाई माँ । दीपिका जी आपकी रचनाएं एक अलग अनुभव देतीं हैं ।

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  22. अब अपनी परवाह
    खुद कर सकते हैं बच्चे
    ज़िंदगी से जूझ सकते,
    लड़ सकते हैं बच्चे।
    अंधेरे कमरे में
    अपनी चारपाई पर पड़ी है
    मां जो फिर से औरत बन गई है।

    माँ की स्थिति का सही जायजा लेती रचना ... बहुत सुंदर

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  23. 'माँ' - एक रिश्ता जो सिर्फ़ देना जानता है,अपने लिये कभी कुछ चाहा ही कहाँ !

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  24. भावप्रवण कविता , आभार

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  25. बहुत सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई

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  26. एक बेहतरीन कविता जो कई स्तरों पर हमारे मन को स्पर्श करती है।

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  27. माँ पर लिखी हर रचना माँ की तरह ही पाक होती है ....
    बहुत सुंदर .....!!

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  28. अब अपनी परवाह
    खुद कर सकते हैं बच्चे
    ज़िंदगी से जूझ सकते,
    लड़ सकते हैं बच्चे।
    अंधेरे कमरे में
    अपनी चारपाई पर पड़ी है
    मां जो फिर से औरत बन गई है।
    बेहतरीन कविता। क्या माँओं की नियति यही है?

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  29. अब अपनी परवाह
    खुद कर सकते हैं बच्चे
    ज़िंदगी से जूझ सकते,
    लड़ सकते हैं बच्चे।
    अंधेरे कमरे में
    अपनी चारपाई पर पड़ी है
    मां जो फिर से औरत बन गई है।

    आपकी कविता इतनी अच्छी लगी कि फिर से एक बार पढने का मन किया एवं मैं अपने को रोक न सका । आशा है आप मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाने की कोशिश जरूर कीजिएगा । धन्यवाद ।

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  30. दीपिका जी, नमस्कार !!
    "माँ" एक ऐसा महामंत्र है जो हमारी जिंदगी में खुशियाँ भर देती है !!
    बहुत ही सुंदर रचना ,,,, अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयी ....

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  31. दीपिका जी आपने माँ बनने के पश्चात् एक महिला का वर्णन किया है......कि कैसे एक माँ हर चीज़ से अंजान पर समझ जाती है, अपने बच्चे की न समझ पाने वाली जुबां को...ऐसे ही रचनाएँ अब आप शब्दनगरी पर भी लिखकर प्रकाशित कर सकतें हैं....

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