दिसंबर 08, 2012

चांदनी गीली है...



खिड़की पर चांद है
भीतर स्याह रात
रोशनी और सियाही में
हाथ भर का फासला है
खोल दे खिड़कियां
खींच ला चांद कमरे में
इंतज़ार बहुत हुआ
रात गुज़र जाने का।

चांद के साथ
गलबहियां डाले
उसी झरने के पास
बैठे रहें चुपचाप।
घुलती रहे रात
आहिस्ता आहिस्ता
चांदनी के प्याले में
आखिरी घूंट तक
और वक्‍त गुज़र जाए
फिर सहर होने तक।

तेरी चांदनी के सफहों पर
मन की स्याही से
हर रात लिखा करते थे
अपनी मुस्कुराहटें
अपनी उदासियां
आज जब शहर की रोशनियों में
तेरा अक्स फीका सा लगता है
बहुमंजिला इमारत की छत से
तू और दूर नजर आता है
मेरा बावरा मन
फिर वही मासूम चांद चाहता है
शायद तुझे भी है खबर
कि आज मेरे जज्बात सीले हैं
तभी तू रोया है शायद
आज बरसों बाद चांदनी गीली है.......

नवंबर 02, 2012

करवा चौथ


आज मैंने मांगी है
सलामती की दुआ
तुम्हारे लिए नहीं
उन करोड़ों के लिए
जिनके लिए तुम्हारा हर दिन
करवा चौथ है

मैंने रखा है व्रत
साल के एक दिन
और तुमने
संकल्प लिया है
आजीवन एक व्रत का
मैं सुनती हूं
चूड़ियों की खनक के साथ
सुहागिनों के गीत
तुम्हारे कानों में बजती हैं
रोज़ सरहद पर
बम गोलों की आवाज़

वक्त नहीं है
मेरे या तुम्हारे पास
आंसुओं का, आहों का
विरह में व्याकुल
चांदनी रातों का
मां के घुटनों की मालिश
बाबूजी की दवाई
और गुड़िया की परीक्षा में
तुम्हारी याद घुलमिल सी जाती है

समाज विज्ञान की किताब से
अधिकार और कर्तव्य का पाठ
गुड़िया को याद कराते
दबोच लेती है मुझे
एक गहरी नींद
मुंदी पलकों में
कोई सपना नहीं
कल की जिम्मेदारियां हैं

चलो आज साथ-साथ चांद देखें
और वादा करें
सच्चाई के साथ निभाएंगे
अपना-अपना व्रत
अपने मोर्चों पर
पीठ नहीं दिखाएंगे
मेरे सिपाही
तुम्हें मुबारक हो
यह करवा चौथ!

सितंबर 20, 2012

चांद और ढिबरी



बुधिया को पसंद नहीं
अंधेरी रातें

जब घुप्प अंधेरे में
डर कर जगी मुनिया
देख नहीं पाती
मां की दुलार भरी आंखें
सांवले माथे पर
बड़ी सी लाल बिंदी
तो रो-रोकर
उठा लेती है
आसमान सिर पर
और बुधिया की नींद से बोझल आंखें
कातर हो उठती हैं

पारसाल तीज पर खरीदी
कांच की चूड़ियां भी
बस दो ही रह गई हैं।
चूड़ियों की खनक के बगैर
खुरदरी हथेलियों की थपकियां
मुनिया को दिलासा नहीं देतीं
काजल लगी बड़ी बड़ी आंखें
जब अंधेरे से टकरा कर लौट जाती हैं
मां के सीने से लगकर भी सोती नहीं
अंधेरी रातों में
कितना रोती है मुनिया

परेशान बुधिया
अपनी झोंपड़ी में
रात भर जलाती है ढिबरी
हवाओं से आग का नाता
उसकी पलकें नहीं झपकने देता
रात भर जलती ढिबरी
कटौती कर जाती है
बुधिया के राशन में

तभी उसे अच्छी लगती हैं
चांदनी रातें
जब चांद की रोशनी
उसकी थाली की रोटियों में
ग्रहण नहीं लगाती
सोती हुई मां की बिंदी में उलझी मुनिया
खिलखिलाती है
महबूब का चेहरा या
बच्चे का खिलौना नहीं
बुधिया का चांद तो एक ढिबरी है।

अगस्त 29, 2012

क्या तुम्हें याद है?

बहुत दिनों से कुछ नया नहीं लिख पाई। तो फिलहाल एक निरंतरता बनाए रखने के लिए अपने ब्लॉग की पहली पोस्ट, रीपोस्ट कर रही हूं जो मेरे दिल के बेहद करीब है.... 


 ...


क्या तुम्हें याद है? 
जब बागानों में 
हौले से उतरती शाम, 
तुम्हें कुछ लम्हों की सलाई दे जाती थी
सपने बुनने के लिए।
नज़रों से गुम होते लाल गोले के साथ
जब आसमान पर सियाही फैलती थी
तो उतरते थे जमीन पर 
कुछ अनछुए ख्वाब
और पैरों के नीचे 
पत्तों की चरमराहट भी
चौंका जाती थी।

बांस के झुरमुट के पीछे वो पहाड़ी झरना 
क्या आज भी बहता है?
जिसकी कल-कल 
तुम्हारी खिलखिलाहट को
कुछ यूं समा लेती थी 
कि दोनों को अलग करना 
एक पहेली होता था। 
उसके किनारे बैठ तुम देर तक
मुझे सोचा करती थी।

तुम्हें याद हैं?
वो साफ पानी में अपना अक्स देखना? 
वो बनती-बिगड़ती शक्लें। 
यहां तो टूटी सड़क पर जमे 
बारिश के मटमैले पानी में 
कुछ भी साफ नहीं दिखता। 

वो हवा जो तुम्हें सहलाकर 
सिहरा जाती थी।
वो चांदनी जो तुम्हें 
बाहों में समेटती थी,
तो डाह होती थी, 
चांद की किस्मत से।
वो उजास चांदनी की थी
या तुम्हारे मन की?

छत पर देखना
चांद और बादलों की लुकाछिपी, 
वो उंगलियों से तारे गिनना। 
तुम्हें याद है? 
तुम्हारी आंखों की कूची 
कैसे सपनों में रंग भरा करती थी। 
यहां तो तितलियों के पंख भी बेरंग हो गए हैं!

चाय की पत्तियां तोड़ती मां की पीठ पर बंधा 
वो नन्‍हा बच्चा 
जो तुम्हें देखकर मुस्कुराता था। 
लालबत्ती पर रुकी गाड़ी के शीशे थपथपाते 
इस बच्चे की आंखें उससे बहुत अलग हैं। 

जब कभी रात अकेली होती है, 
तुम बहुत याद आती हो। 
पर हमारे बीच बरसों का फासला है।
हम उतने ही अलग हैं, 
जितना तुम्हारे पहाड़ी झरने से 
मेरी सूखती हुई नदी।
हम रेल की पटरियां तो नहीं 
लेकिन जमीन और आसमान हो सकते हैं। 
कहीं दूर, 
सपनों के क्षितिज में, 
मिल तो सकते हैं!

जुलाई 21, 2012

मुखौटा



राह चलते लोग
अक्सर खो देते हैं
अपनी आंखों की रोशनी
नज़रों के आगे होती है
उनकी मंज़िल
और मंज़िल की साधना में
वे अर्जुन होते हैं।
उन्हें दिखती है
चिड़िया की बाईं आंख
और बाकी चीज़ें धुंधली हो जाती हैं।

राह चलते लोग
मोह-माया से निर्लिप्त होते हैं
उन्हें नज़र नहीं आते
लड़कियों के फटते कपड़े
उन्हें नहीं दिखते
मचलते मसलते हाथ
दीन दुनिया से बेखबर होते हैं
राह चलते लोग।

एसी कमरों में
टीवी देखते लोगों की
असंख्य आंखें होती हैं
उनका मन कराहता है
सड़कों पर उतरती इज्ज़त से।
उनके हाथों में
सुबह का अखबार,
चाय की प्याली होती है
और दिल में सुलगती हुई आह
कब बदलेगा हमारा देश!”
कब होगी नारियों की इज्ज़त!”

एसी कमरों में
टीवी देखते लोग
दुनिया की परवाह करते हैं।
वे उफनते हैं
देश के बिगड़ते हालात पर।
दुर्योधनों की दरिंदगी पर
उनका खून खौलता है।

टीवी देखते लोग
कभी सड़कों पर नहीं उतरते
सड़कों पर चलते है
बस अर्जुन के मुखौटे
अर्जुन को दिखती है
चिड़िया की बाईं आंख
और चीरहरण के समय
वे अंधे हो जाते हैं।


जुलाई 03, 2012

शोर



हल्के सिंदूरी आसमान में
उनींदा सा सूरज
जब पहली अंगड़ाई लेता है,
मेरी खिड़की के छज्जे पर
मैना का एक जोड़ा
अपने तीखे प्रेमालाप से
मेरे सपनों को झिंझोड़ डालता है।
गुस्से से भुनभुनाते होंठ
आंखें खुलते ही न जाने क्यों 
टू फॉर ज्वॉय बोल जाते हैं।

मंद हवाओं की ताल पर
झरने का बेलौस संगीत
भोर का एकांत बिखेर देता है।
बर्फीले पानी में
नंगे बच्चों की छपाक-छई से
पसीज गए हैं मेरी आंखों में
कुछ ठिठुरे हुए लम्हे।
छलकते पानी के साथ
हवाओं में बिखर गई है
कुछ मासूम खिलखिलाहटें।
मन करता है
अंजुरी अंजुरी उलीच लाउं
फिर उसी झरने से
कुछ खोई हुई खिलखिलाहटें।

चाय की फैक्ट्री में ठीक आठ बजे उठता अलार्म
कच्चे घरों में हलचल मचा देता है।
चाय में रात की रोटी भिगोती अधीर उंगलियां
एक और लंबे दिन के लिए तैयार हैं।
वफादारी दिखाने को व्यग्र कुत्ता
चरमराते पत्तों की आवाज़ पर भी भौंकता है
नए नए पैरों से लड़खड़ाते हुए दौड़ता बछड़ा
रंभाती मां की आवाज़ सुन
चुपचाप उसके जीभ तले गर्दन रख देता है।
बिन बुलाए मेहमान सा
कभी भी बरस पड़ता
मेघ का टुकड़ा
टीन के छप्पर पर कितना शोर मचाता है।
आज भी कानों में
इस कदर गूंजता है वह शोर
कि भीड़ भरे शहर का सन्नाटा
अब चिढ़ाता है मुझे।

मई 24, 2012

कवि और कमली


 
तुम श्रृंगार के कवि हो
मुंह में कल्पना का पान दबाकर
कोई रंगीन कविता थूकना चाहते हो।
प्रेरणा की तलाश में
टेढ़ी नज़रों से
यहां-वहां झांकते हो।
अखबार के चटपटे पन्‍नों पर
कोई हसीन ख्वाब तलाशते हो।

तुम श्रृंगार के कवि हो
भूख पर, देश पर लिखना
तुम्हारा काम नहीं।
क्रांति की आवाज उठाने का
ठेका नहीं लिया तुमने।
तुम प्रेम कविता ही लिखो
मगर इस बार कल्पना की जगह
हकीकत में रंग भरो।
वहीं पड़ोस की झुग्गी में
कहीं कमली रहती है।
ध्यान से देखो
तुम्हारी नायिका से
उसकी शक्ल मिलती है।

अभी कदम ही रखा है उसने
सोलहवें साल में।
बड़ी बड़ी आंखों में
छोटे छोटे सपने हैं,
जिन्हें धुआं होकर बादल बनते
तुमने नहीं देखा होगा।
रूखे काले बालों में
ज़िन्दगी की उलझनें हैं,
अपनी कविता में
उन्हें सुलझाओ तो ज़रा!

चुपके से कश भर लेती है
बाप की अधजली बीड़ी का
आग को आग से बुझाने की कोशिश
नाकाम रहती है।
उसकी झुग्गी में
जब से दो और पेट जन्मे हैं,
बंगलों की जूठन में,
उसका हिस्सा कम हो गया है।

तुम्हारी नज़रों में वह हसीन नहीं
मगर बंगलों के आदमखोर रईस
उसे आंखों आंखों में निगल जाते हैं
उसकी झुग्गी के आगे
उनकी कारें रेंग रेंग कर चलती हैं।
वे उसे छूना चाहते हैं
भभोड़ना चाहते हैं उसका गर्म गोश्‍त।
सिगरेट की तरह उसे पी कर
उसके तिल तिल जलते सपनों की राख
झाड़ देना चाहते हैं ऐशट्रे में।

उन्हें वह बदसूरत नहीं दिखती
नहीं दिखते उसके गंदे नाखून।
उन्हें परहेज नहीं,
उसके मुंह से आती बीड़ी की बास से।
तो तुम्हारी कविता
क्यों घबराती है कमली से।
इस षोडशी पर....
कोई प्रेम गीत लिखो न कवि!

मई 12, 2012

औरत जब बनती है मां

मां तो हमेशा मां होती है, फिर उसके लिए मदर्ड डे के नाम पर एक दिन क्यों? इससे बेहतर कि हम उसे वह सम्मान दें जिसकी वह असली हकदार है। आज अपनी एक साल पुरानी एक कविता यहां शेयर कर रही हूं.......
 
चाहे न हो उसे,
पोथियों का ज्ञान।
उठने-बैठने,
बोलने, हंसने के सलीके
से हो अनजान।
पर सीख लेती है,
क्षण भर में एक जुबां
औरत जब बनती है मां।

उसका हंसना-रोना,
सब पहचानती है।
वह मां है,
हर बात जानती है।
उसकी एक आवाज पर भागती है,
मां उसकी आंखों से,
सोती है, जागती है।

जिन डगमग पांवों को,
वह चलना सिखाती है।
जब वे दौड़ जाते हैं,
वह पीछे रह जाती है।
उसे नहीं आती अंग्रेजी,
उनके दोस्तों में मिक्स-अप होना।
वह नहीं जानती,
कि एंबेरेसिंग होता है,
सब के सामने हंसना-रोना।

जब होते हैं बाल सफेद,
ज़िंदगी की धूप में।
आधुनिकता की डाई से
बच्चे रंगना चाहते हैं,
उसे नए रूप में।
जिनकी मूक भाषा भी,
कभी झट से समझती है।
आज उनकी बोली
अजनबी सी लगती हैं

अब अपनी परवाह
खुद कर सकते हैं बच्चे
ज़िंदगी से जूझ सकते,
लड़ सकते हैं बच्चे।
अंधेरे कमरे में
अपनी चारपाई पर पड़ी है
मां जो फिर से औरत बन गई है।