दिसंबर 30, 2011

गज़ल


तेज भंवरों से उबरने का नहीं सबको हुनर।
डूबने का डर किसे, जब साथ हो अपने समन्दर।

लब खुलें तो एक हलचल सी ज़माने में मचे,
ला जुबां में आज तू ऐसी खनक, इतना असर।

जख्म गिनकर मंजिलों की राह मत दुश्‍वार कर,
देख सागर तक नदी किस तरह तय करती सफर।

वो हैं नादां जो शबे गम से तड़प कर रो दिए,
हम चले हैं संग में अपने लिए अपना सहर।

क्यों शिकायत हो हमें इन शोख लहरों से भला,
साहिलों पर रेत का जब खुद बनाया था नगर।

7 टिप्‍पणियां:

  1. वो हैं नादां जो शबे गम से तड़प कर रो दिए,
    हम चले हैं संग में अपने लिए अपना सहर।

    वाह बहुत खूबसूरत शेर है...लाजवाब...आप बहुत अच्छी ग़ज़ल कह सकती हैं थोडा तकती करने का अभ्यास करें ताकि सभी शेर एक बहर में आ जाएँ आपके मतले और फिर तीसरा शेर वजन से गिर रहा है...कोई बात नहीं अभ्यास से सब ठीक हो जायेगा...मुझे उम्मीद है आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगीं...

    नीरज

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  2. अन्यथा लेने का सवाल ही नहीं नीरज जी। दरअसल ग़ज़ल की मुझे बहुत समझ नहीं है। कभी-कभी यूं ही कुछ लिख डालती हूं। हौसलाअफ़जाई का शुक्रिया.. और इसी तरह कमियां बताते रहिए ताकि लेखन और बेहतर हो सके।

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  3. क्यों शिकायत हो हमें इन शोख लहरों से भला,
    साहिलों पर रेत का जब खुद बनाया था नगर।

    वाह!खूबसूरत ग़ज़ल का बेहतरीन शेर!

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  4. वो हैं नादां जो शबे गम से तड़प कर रो दिए,
    हम चले हैं संग में अपने लिए अपना सहर।
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल .....
    बधाई.......
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  5. वाह ... लाजबाब भाव हैं आपकी गजल में तो .देखिये न...
    जख्म गिनकर मंजिलों की राह मत दुश्‍वार कर,
    देख सागर तक नदी किस तरह तय करती सफर।
    ...बहुत खूब ...नीरज जी की बात पर ध्यान देना आप जरूर..क्योंकि गज़ल में जितना भाव अहम है उतना है उसका व्याकरण
    क्षमा चाहता हूँ !

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