दिसंबर 27, 2011

समय और हम..



समय की सिलवटों में
मेरे प्यार
की सीवन नहीं उधड़ी है
समय-समय पर
मिल कर हम ने
उसकी सिलाई पक्‍की की है।

फर्क बस इतना है कि
उसे जताने
या दिखाने की
छत की मुंडेर से चिल्‍लाने की
अब जरूरत नहीं।

न दरकार है,
पुरानी यादों की,
या पूरे-अधूरे वादों की,
अब दिखता नहीं
सिर्फ महसूस होता है
सतह पर जमा प्यार
अब गहरे पैठ गया है!

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरी बात...प्रेम की परिपक्वता- एक अहसास...एक अनुभूति!!

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  2. फर्क बस इतना है कि
    उसे जताने
    या दिखाने की
    छत की मुंडेर से चिल्‍लाने की
    अब जरूरत नहीं।

    वाकई बहुत अच्छा लिखा है आपने।

    सादर
    -----

    जो मेरा मन कहे पर आपका स्वागत है

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  3. एक निवेदन
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।
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  4. धन्यवाद समीर जी और यशवंत माथुर जी।

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  5. वाह...भावपूर्ण गहरी रचना...बहुत बहुत बधाई...

    नीरज

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  6. कविता पसंद करने के लिए धन्यवाद नीरजजी..

    उत्तर देंहटाएं
  7. छत की मुंडेर से चिल्‍लाने की
    अब जरूरत नहीं।
    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...!

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