फ़रवरी 20, 2012

हिसाब



जब बिछड़े थे उन राहों से
तेरे कांधे पे ही
सर रख के रोए थे।
ऐ शहर
तेरा इतना एहसान तो है हम पर।
मगर सर्द रातों में अक्सर
घूरे में जलते पुआल
की नर्म आंच याद आती है
तो तेरे हीटर की गरमी
बस रह जाती है
बदन के आस-पास
और रूह ठंडी रह जाती है।

हां तेरी रातें अंधेरी नहीं होतीं
तभी तो तारों को भी
शर्म आती है यहां।
नाजुक सी बाती में भीगी रात का नशा
पुरानी शराब सा चढ़ता है,
तेरी रोशन रातों को क्या पता !
मैंने तो जुगनुओं के परों पर
सूरज को चलते देखा था।

अब तो तेरी धड़कनों में
मेरी सांसें यूं घुली हैं।
कि मेरी लकीरें,
तेरी हथेलियों में बनी हैं।
मगर सुन मुझे बेवफा मत कहना।
पुरानी हवाओं की खुश्बू पर
मेरा कोई अख्तियार नहीं।
ये तुझसे जो आशनाई है
दरअसल उसी ने सिखाई है।

तेरी रवायतों से,
कोई शिकवा नहीं है मुझको।
मगर जिस दिन पुरानी रातें
मेरे ख्वाबों का बोझ उठाने
का मेहनताना मांगेंगी।
कच्ची पगडंडियां मेरे कदमों के
असली निशान ढूंढेंगी।
जिस दिन आईना
मेरे नकाब के पीछे
एक चेहरा खोजेगा।
जब एक रूठा गांव
मुझसे जवाब मांगेगा।
तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
मुझे हिसाब देने के लिए।

25 टिप्‍पणियां:

  1. सबको आखिर एक दिन हिसाब देना होगा.....!
    ...पर प्यार हिसाब-किताब पाने के लिए नहीं होता !

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  2. जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
    मुझे हिसाब देने के लिए।

    अर्थपूर्ण , छूट कर भी कुछ नहीं छूटता ......

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  3. कच्ची पगडंडियां मेरे कदमों के
    असली निशान ढूंढेंगी।
    जिस दिन आईना
    मेरे नकाब के पीछे
    एक चेहरा खोजेगा।
    जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,

    अच्छी पंक्तियाँ \,बढ़िया प्रस्तुति,....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी कविता ....

    शब्द ध्यान बांधते हैं ....अच्छा लिखती हैं आप ....

    सार्थक लेखन ....

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  5. अब तो तेरी धड़कनों में
    मेरी सांसें यूं घुली हैं।
    कि मेरी लकीरें,
    तेरी हथेलियों में बनी हैं... is rishte ko kaise bhulega shahar

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  6. गहरे और सुन्दर शब्द...इस भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  7. खूबसूरत सार्थक प्रस्तुति.
    बहुत अच्छा लगा आपको पढकर.
    आभार.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा.

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  8. बेहतरीन व सार्थक रचना. बधाई.

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  9. बहुत सुन्दर..भावपूर्ण रचना...

    शुभकामनाएँ..

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  10. जिस दिन आईना
    मेरे नकाब के पीछे
    एक चेहरा खोजेगा।
    जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
    मुझे हिसाब देने के लिए।

    बहुत अच्छी कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  11. तेरी रवायतों से,
    कोई शिकवा नहीं है मुझको।
    मगर जिस दिन पुरानी रातें
    मेरे ख्वाबों का बोझ उठाने
    का मेहनताना मांगेंगी।
    कच्ची पगडंडियां मेरे कदमों के
    असली निशान ढूंढेंगी।
    जिस दिन आईना
    मेरे नकाब के पीछे
    एक चेहरा खोजेगा।
    जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
    मुझे हिसाब देने के लिए।
    sunder bhav
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  12. जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
    मुझे हिसाब देने के लिए।

    बहुत सुंदर । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  13. भाव पूर्ण रचना है .. गहरे अर्थ लिए ..

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  14. जब एक रूठा गांव
    मुझसे जवाब मांगेगा।
    तू भी तैयार रहना ऐ शहर,
    मुझे हिसाब देने के लिए।

    क्या बात कही है...बहुत बढ़िया कविता

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  15. गहरे अर्थ लिए ,बहुत सुंदर कविता....

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  16. "अब तो तेरी धड़कनों में
    मेरी सांसें यूं घुली हैं।
    कि मेरी लकीरें,
    तेरी हथेलियों में बनी हैं"
    हम्म्म बेहतरीन ...

    पहली बार यहाँ आया हूँ। अगर मदन (राँची) ने नहीं बतालाया होता तो मुझे पता ही नहीं चलता। पूरी पोस्टस तो नहीं देख पाया पर जितना पढ़ा अच्छा पाया !

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  17. बेहिसाब दर्द को समेटे है यह गीत हिसाब।

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