फ़रवरी 03, 2012

तीस्ता: तुम बेमिसाल हो



नाजों से खेली हो
पहाड़ों की गोद में।
लाड़ से पाला है हिमालय ने तुम्हें,
ऊंचे चीड़ों ने
छुपा कर रखा है,
सूरज की बुरी नज़र से।
पर कहां बंधन मानती हैं
तुम्हारी लहरें।
ठहर कर सोचना
तो तुम्हें आता ही नहीं।
शोखी का दूसरा नाम हो तुम।

जब उतरती हो पहाड़ों से,
कूदती, इठलाती, बलखाती।
किनारों को छूकर
यूं सर्र से निकल जाती।
मुझे पकड़ो तो जानें
कहकर शायद जीभ चिढ़ाती।
कदमों में पड़ी हर शै को ठुकराती।
तुम्हारा गुरूर सर आंखों पर।

कितनी हसरत से देखता है तुम्हें
वह दीवाना पुल
रोजाना गुजरते हुए।
न वह झुकता है,
न तुम हाथ बढ़ाती हो।
उसकी तरसती निगाहों के नीचे से
चुपचाप निकल जाती हो।
तुम जानती हो अपनी हदें।
तुम्हारी हर बात बेमिसाल है।

रंगित के साथ
लौट आता है तुम्हारा बचपन
सहेलियों सी गले मिलती, खिलखिलाती
बढ़ती जाती हो आगे
रुकना तुम्हारी आदत कहां।
कभी मुग्ध, कभी स्तब्ध करता है
तुम्हारा उफनता यौवन।
बुरुंश के सुर्ख श्रृंगार से
तुम्हारी हरी काया
और भी खिल उठती है।
तुम जानती हो
कहीं कोई इंतज़ार में है तुम्हारे।

तुम्हारी दीवानगी
नहीं जानती सीमाएं।
पहाड़ों की, मैदानों की, मज़हबों की, देशों की।
बस एक धुन है,
एक ही मुस्तकबिल।
जब तुम्हारी आहट पाकर
वह बेताब हो उठता है,
तुम्हें समेटने को।
और तुम अधीर सी
समा जाती हो,
अपने ब्रह्मपुत्र की बाहों में
तो यह ख्याल आता है
कि तुम तीस्ता हो,
या खामोश इश्क की एक दास्तान!

तीस्ता नदी भारत के सिक्किम की लाइफलाइन कही जाती है, यह खूबसूरत नदी इस छोटे से राज्य को एक अद्वितीय आकर्षण देती है। वह सिक्किम का पूरा सफर तय करके नीचे उतरते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा से बाहर निकलकर बंगलादेश में ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। रंगित उसकी एक मुख्य उप नदी है।

30 टिप्‍पणियां:

  1. कभी एक गीत सुना था...
    तीस्ता नदी सी तू चंचला...मैं भी हूँ बचपन से मनचला...
    :-)

    बहुत सुन्दर चित्रण...

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  2. बेहतरीन रचना, निःसंदेह सराहनीय........
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता, कुत्ता और वेश्या

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  3. बेहतरीन बिम्ब लेकर लिखे ख्याल , सुंदर

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  4. कि तुम तीस्ता हो,
    या खामोश इश्क की एक दास्तान…………कितना खूबसूरत चित्रण किया है…………शानदार्।

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  5. कितनी हसरत से देखता है तुम्हें
    वह दीवाना पुल
    रोजाना गुजरते हुए।
    न वह झुकता है,
    न तुम हाथ बढ़ाती हो।
    उसकी तरसती निगाहों के नीचे से
    चुपचाप निकल जाती हो।
    तुम जानती हो अपनी हदें।
    तुम्हारी हर बात बेमिसाल है।

    bahut sundar aur prabhavshali chitran testa ka kiya ....bilkul lajabab rachana badhai Diepika ji

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  6. इस नदी के बारे में मुझे नहीं पता था.अच्छा लिखा आपने.

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  7. बहती हुयी तीस्ता की तरह बहती हुयी रचना ... बेहद लाजवाब ..

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  8. तीस्ता सजीव हो उठी है इस सुंदर कविता में।

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  9. teesta nadi ka manohari lajawab chitran...
    Teesta nadi jiwant ho chali...

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  10. दो साल पहले ही तीस्ता दरन हुए अपनी गंगटोक और दार्जलिंग यात्रा में...बेहतरीन रचना!!

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  11. bahut vachchi lagi......tista nadi ke sath mujhe bhi safar karne ka awsar mila tha.

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  12. नाजों से खेली हो
    पहाड़ों की गोद में।
    लाड़ से पाला है हिमालय ने तुम्हें,
    ऊंचे चीड़ों ने
    छुपा कर रखा है,
    सूरज की बुरी नज़र से।
    पर कहां बंधन मानती हैं
    तुम्हारी लहरें।
    ठहर कर सोचना
    तो तुम्हें आता ही नहीं।
    शोखी का दूसरा नाम हो तुम।

    मनोरम चित्रण - बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  13. बेहतरीन प्रस्तुति है । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  14. रंगित के साथ
    लौट आता है तुम्हारा बचपन
    सहेलियों सी गले मिलती, खिलखिलाती
    बढ़ती जाती हो आगे
    रुकना तुम्हारी आदत कहां।
    कभी मुग्ध, कभी स्तब्ध करता है
    तुम्हारा उफनता यौवन।
    बुरुंश के सुर्ख श्रृंगार से
    तुम्हारी हरी काया
    और भी खिल उठती है।
    तुम जानती हो
    कहीं कोई इंतज़ार में है तुम्हारे।
    bahut hi sunder chitran aur us par Tista ka ek navyovana ka sdrish prastuti karan behad achha laga , achhi rachna !

    Hari Attal
    Bhilai C G

    उत्तर देंहटाएं





  15. कितनी हसरत से देखता है तुम्हें
    वह दीवाना पुल
    रोजाना गुजरते हुए।
    न वह झुकता है,
    न तुम हाथ बढ़ाती हो।
    उसकी तरसती निगाहों के नीचे से
    चुपचाप निकल जाती हो
    तुम जानती हो अपनी हदें
    तुम्हारी हर बात बेमिसाल है…

    आहाऽऽहाऽ…
    बहुत सुंदर और सजीव चित्रण किया है…
    क्या बात है !

    तुम्हारी दीवानगी
    नहीं जानती सीमाएं।
    पहाड़ों की, मैदानों की, मज़हबों की, देशों की।
    बस एक धुन है,
    एक ही मुस्तकबिल।
    जब तुम्हारी आहट पाकर
    वह बेताब हो उठता है,
    तुम्हें समेटने को।
    और तुम अधीर सी
    समा जाती हो,
    अपने ब्रह्मपुत्र की बाहों में
    तो यह ख्याल आता है
    कि तुम तीस्ता हो,
    या खामोश इश्क की एक दास्तान!


    वाह! बहुत बहुत सुंदर कविता है …

    तीस्ता की ही तरह आपकी कविता भी बेमिसाल है…
    दीपिका रानी जी !

    बहुत आनंद आया आपके यहां आ'कर …
    …आपकी पुरानी पोस्ट्स पढ़ने आऊंगा फिर से …

    … और नई भी :))

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. तुम नदी नहीं
    हमारी सहचर हो,
    दुःख में,सुख में
    हमेशा मेरे साथ,
    जीवन की पूर्णता का नाम हो तुम !

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  17. तीस्ता नदी और इश्क़ की दास्तान ... अद्भुत चित्रण

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  18. बहुत सुंदर शब्दों का संयोजन बधाई

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  19. वाह, बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है ।..

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  20. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  21. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.
    पढकर हृदय में आनंद की हिलोरे उठने लगी हैं.
    आपकी अनूठी काव्य प्रतिभा को नमन.

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  22. वाह!!लाजवाब!!
    तीस्ता तो मर मिटेगा आपकी इस कविता पर ;)

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  23. बहुत संदर अभिव्यक्ति, लगता है भाव - प्रवाह लिए तीस्ता हो गया है आपका मन...।

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  24. कितनी हसरत से देखता है तुम्हें
    वह दीवाना पुल
    रोजाना गुजरते हुए।
    न वह झुकता है,
    न तुम हाथ बढ़ाती हो।
    उसकी तरसती निगाहों के नीचे से
    चुपचाप निकल जाती हो।
    तुम जानती हो अपनी हदें।
    तुम्हारी हर बात बेमिसाल है।
    आपकी कवितायें अलबेली हैं |वाह दीपिका जी

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  25. आपकी इस कविता को मैंने फेसबुक पर आपके चित्र के साथ डाल दिया है |अद्भुत लेखनी को नमन |09005912929

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