जनवरी 12, 2014

फर्क




वह आया
ढोल नगाड़ों के साथ
बरसों की मन्नतों
पीर फकीर के चढ़ावों
देवताओं को दिए रिश्वतों से
अस्पताल के एक वातानुकूलित कमरे में
झक सफेद चादर पर
यह उग आया
एक मादा कोख में
बरसाती घास की तरह।

वह जाता है कान्वेंट स्कूल
दूध टोस्ट खा कर
इस्तिरी की हुई यूनिफार्म पहन
सुंदर स्कूल बैग
नीली पीली पानी की बोतल लटकाए
यह आंखें मलते हुए
निगलता है रात की बची रोटी
बिना दूध की चाय के साथ
और बाल्टी उठा चल देता है
म्युनिसिपिलिटी के नल की ओर

वह जाता है डोनेशन वाले इंजीनियरिंग कॉलेज
खरीदता है
ब्रांडेड जींस
लेटेस्ट गैजेट्स
सीखता है दोस्तों से
गर्लफ्रेंड्स पटाने के नुस्खे
यह लगाता है सब्जी की रेहड़ी
खरीदता है मंडी से
थोक भाव में आलू प्याज
सीखता है अपने बाप से
फ्री की धनिया मिर्च से
मोहल्ले की आंटियों को पटाना।

वह बनाता है इमारतों के नक्शे
यह ढोता है ईंट गारा
यह जाति का चक्र टूटता नहीं
वह अमीर है, यह गरीब।

(चित्र गूगल से साभार)

10 टिप्‍पणियां:

  1. समाज के इस विभाजन को रेखांकित करती एक बहुत ही मार्मिक कविता..
    बहुत दिनों बाद आपकी गतिविधि दिखाई दी है!! आपकी रचनाओं की प्रतीक्षा रहती है!! विस्तार है अपार!! लिखते रहिए, शुभाशीष!!

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  2. इस सनातन अन्तर को बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से दिकाया है आपने दीपिका जी

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  3. निःसंदेह आपकी अभिव्यक्ति प्रभावित करती है। सुंदर शब्दों के सहारे आपने समाज का जो बिंब खींचा है वह अत्यंत मार्मिक है।

    इन दो जातियों के अलावा समाज में एक तीसरी जाति भी है जिसे मध्यम वर्गीय कहते हैं। कुछ इन पर भी कलम चलाइये..:)

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  4. वह बनाता है इमारतों के नक्शे
    यह ढोता है ईंट गारा
    यह जाति का चक्र टूटता नहीं
    उसकी जाति अमीर है, इसकी गरीब।

    ...............वर्तमान का मार्मिक सच लिखा है आपने दीपिका दीदी

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  5. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,लोहड़ी कि हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  6. प्रभावपूर्ण और विचारपूर्ण
    वाह !! बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई ----

    आग्रह है--
    वाह !! बसंत--------

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  7. सच में समाज में फैले "फ़र्क" को चिन्हित करता हुआ

    कपिल वर्मा
    www.bookmitra.com

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