जून 27, 2014

हिज्र का मौसम बुरा था



चांद खिड़की पर खड़ा था
मगर अंधेरा बड़ा था

चांदनी थी कसमसाती
रात का पहरा कड़ा था

उन चरागों को कहें क्या
ज़ोर जिनका इक ज़रा था

जब सुलगती थी हवा भी
हिज्र का मौसम बुरा था

पुराना इक ख़त गुलाबी
मेज़ पर औंधा पड़ा था

टीस रह रह कर उठी थी
जख्म अब तक भी हरा था

नींद पलकों से उड़ी थी
रंग ख्वाबों का उड़ा था

इस अंधेरी रात से पर
भोर का सपना जुड़ा था

अप्रैल 09, 2014

क्या अब भी लिखी जाती है प्रेम कविता?



आजकल जब भी नज़र आती है कोई प्रेम कविता
उसे बड़े चाव से ऐसे पढ़ती हूं
मानो वह प्रेम का आखिरी गीत हो।

क्या अब भी लिखी जाती है प्रेम कविता?

आजकल किराने की दुकान की पर्ची में
एक-एक सामान के दाम को मिलाती हूं
संभाल कर रखी पिछली पर्चियों से
और गुणाभाग करती हूं
उस बचत के पैसों से
जिसमें सेंध मार दी है
महीने के राशन ने।
हर बार फल खरीदते वक्त सोचती हूं
क्या वाकई जरूरी है सेहत के लिए फल खाना?
और सबसे सस्ते फल लेकर
पुचकार लेती हूं दिल और दिमाग दोनों को।
दाल-चावल के साथ सब्जी थोड़ी कम भी तो खाई जा सकती है!
शाम तक जमा-खर्च की एक सीडी चलती रहती है दिमाग में
क्या आजकल राशन, फल खरीदने वाले भी लिखते हैं प्रेम कविता?

घड़ी की सुइयों के साथ नाचती सुबह
देखने नहीं देती बच्ची के चेहरे की अकुलाहट
दो नन्हें पांव भी बिना थके साथ-साथ भागते रहते हैं
गले लगने की उम्मीद में।
बिस्कुट पकड़ने को भी कहां बढ़ते हैं
कस कर चुन्नी पकड़े हाथ
बाथरूम में गिरते पानी के शोर में
कहां सुनाई देती है
बंद दरवाजे पर नन्हें हाथों की थपकियां?
टाटा करते मायूस हाथों की ओर पीठ करके
बस की ओर दौड़ते लोग भी क्या लिखते हैं प्रेम कविता?

अखबारों में भी कहां हैं अच्छी खबरें
चांटों, घूंसों में, गालियों में, तालियों में
सिमट रही है राजनीति
ज्यादा से ज्यादा गिरने की होड़
ज्यादा से ज्यादा लूटने की होड़
नक्सलियों, आतंकियों से भिड़कर जान देने वाले
थोड़ी सी और ज़िन्दगी मांग रहे हैं
अपने बच्चों के लिए
उन्हें पता है, हथेली पर टिकी जान के बदले
दो वक्त जलता चूल्हा
और कितने दिन जल पाएगा
सरकार की भीख से!
रोडरेज, हत्या, बलात्कार की खबरों से भरा
अखबार पढ़ने वाले लोग भी क्या लिखते हैं प्रेम कविता?

तभी आजकल जब नज़र आती है कोई प्रेम कविता
तो मैं पढ़ती हूं उसे हर्फ़-हर्फ़
क्या मालूम यह आखिरी प्रेम कविता ही हो....

जनवरी 12, 2014

फर्क




वह आया
ढोल नगाड़ों के साथ
बरसों की मन्नतों
पीर फकीर के चढ़ावों
देवताओं को दिए रिश्वतों से
अस्पताल के एक वातानुकूलित कमरे में
झक सफेद चादर पर
यह उग आया
एक मादा कोख में
बरसाती घास की तरह।

वह जाता है कान्वेंट स्कूल
दूध टोस्ट खा कर
इस्तिरी की हुई यूनिफार्म पहन
सुंदर स्कूल बैग
नीली पीली पानी की बोतल लटकाए
यह आंखें मलते हुए
निगलता है रात की बची रोटी
बिना दूध की चाय के साथ
और बाल्टी उठा चल देता है
म्युनिसिपिलिटी के नल की ओर

वह जाता है डोनेशन वाले इंजीनियरिंग कॉलेज
खरीदता है
ब्रांडेड जींस
लेटेस्ट गैजेट्स
सीखता है दोस्तों से
गर्लफ्रेंड्स पटाने के नुस्खे
यह लगाता है सब्जी की रेहड़ी
खरीदता है मंडी से
थोक भाव में आलू प्याज
सीखता है अपने बाप से
फ्री की धनिया मिर्च से
मोहल्ले की आंटियों को पटाना।

वह बनाता है इमारतों के नक्शे
यह ढोता है ईंट गारा
यह जाति का चक्र टूटता नहीं
वह अमीर है, यह गरीब।

(चित्र गूगल से साभार)

अगस्त 26, 2013

गरीब की लड़की


जब नन्ही उंगलियां
गंदे मटमैले धोती के टुकड़े से
गरम हंडिया पकड़
पसाती हैं भात
संतुलन में टेढ़ी हंडिया थामे
पकती उंगलियां
हड़बड़ी नहीं दिखातीं

पीती है धीमे धीमे
नथुनों से गर्म माड़ की खुश्बू
हंडिया नहीं छोड़ती
गरीब की लड़की
आखिरी बूंद के टपक जाने तक

एकटक हंडिया पर नजरें जमाए
सटकर उकड़ू बैठे
छोटे भाई-बहनों को आंख दिखाती है
और भात मांगते छोटे भाई को
थप्पड़ जमाती गरीब की लड़की
डाल देती है उसकी थाली में
अपने हिस्से का एक करछुल भात
जानती है
कि आज भी उसे
माड़ से मिटानी होगी भूख

म्युनिसिपैलिटी के नल से पानी भरते हुए
गरीब की लड़की
रोज नुक्कड़ से देखती है
स्कूल जाती लड़कियों को
उसे नहीं लुभाते
कड़क प्रेस की हुई स्कूल ड्रेस
या बार्बी वाले बैग
उसकी आंखें जमी हैं
बैग से झांकते लंच बॉक्स पर
ख्वाबों में देखती है
प्लास्टिक के हरे-नीले जादुई डिब्बे में
आलू के परांठे
वेजिटेबल सैंडविच

गरीब की लड़की
नहीं जानती बराबरी का हक
नारी सशक्तीकरण
उसे नहीं चाहिए आसमान
वह चाहती है थोड़ी सी जमीन
वह प्यार नहीं करती
उसे करनी है शादी
जहां वह दबाएगी पैर
बिछ जाएगी आदमी की देह तले
और खा पाएगी
पेट भर भात
शायद

अगस्त 12, 2013

कवि और कमली

कमली एक बार फिर से...


तुम श्रृंगार के कवि हो
मुंह में कल्पना का पान दबाकर
कोई रंगीन कविता थूकना चाहते हो।
प्रेरणा की तलाश में
टेढ़ी नज़रों से
यहां-वहां झांकते हो।
अखबार के चटपटे पन्‍नों पर
कोई हसीन ख्वाब तलाशते हो।

तुम श्रृंगार के कवि हो
भूख पर, देश पर लिखना
तुम्हारा काम नहीं।
क्रांति की आवाज उठाने का
ठेका नहीं लिया तुमने।
तुम प्रेम कविता ही लिखो
मगर इस बार कल्पना की जगह
हकीकत में रंग भरो।
वहीं पड़ोस की झुग्गी में
कहीं कमली रहती है।
ध्यान से देखो
तुम्हारी नायिका से
उसकी शक्ल मिलती है।

अभी कदम ही रखा है उसने
सोलहवें साल में।
बड़ी बड़ी आंखों में
छोटे छोटे सपने हैं,
जिन्हें धुआं होकर बादल बनते
तुमने नहीं देखा होगा।
रूखे काले बालों में
ज़िन्दगी की उलझनें हैं,
अपनी कविता में
उन्हें सुलझाओ तो ज़रा!

चुपके से कश भर लेती है
बाप की अधजली बीड़ी का
आग को आग से बुझाने की कोशिश
नाकाम रहती है।
उसकी झुग्गी में
जब से दो और पेट जन्मे हैं,
बंगलों की जूठन में,
उसका हिस्सा कम हो गया है।

तुम्हारी नज़रों में वह हसीन नहीं
मगर बंगलों के आदमखोर रईस
उसे आंखों आंखों में निगल जाते हैं
उसकी झुग्गी के आगे
उनकी कारें रेंग रेंग कर चलती हैं।
वे उसे छूना चाहते हैं
भभोड़ना चाहते हैं उसका गर्म गोश्‍त।
सिगरेट की तरह उसे पी कर
उसके तिल तिल जलते सपनों की राख
झाड़ देना चाहते हैं ऐशट्रे में।

उन्हें वह बदसूरत नहीं दिखती
नहीं दिखते उसके गंदे नाखून।
उन्हें परहेज नहीं,
उसके मुंह से आती बीड़ी की बास से।
तो तुम्हारी कविता
क्यों घबराती है कमली से।
इस षोडशी पर....
कोई प्रेम गीत लिखो न कवि!

मई 23, 2013

चंद हाइकु

कुछ समय पहले कुछ हाइकु लिखे थे जो hindihaiku.wordpress.com पर प्रकाशित हुए थे। आज सोचा उसे यहां भी शेयर करूं। दिन के चार अलग-अलग समयों पर लिखे हाइकु पेश हैं:

1
भोर का राग
बुलबुल ने गाया
अब तो जाग

2
संदली दिन
लागे अमावस सा
पिया के बिन

3
सूरज लाल
सांझ की महफिल
जमी कमाल

4
रात नशीली
चांदनी में घोली थी
किसने पी ली?

कुछ और हाइकु लिखने की कोशिश की थी। विवाह के समय एक बिटिया की मनस्थितियों पर -


 
1
मां का आंचल
जीवन की धूप में 
जैसे बादल

2
कोई न भूले
बाबुल की गलियां
बाहों के झूले

3
बहना प्यारी
आएगी याद अब
बातें तुम्हारी

4
ओ री सहेली
जीवन ये लागे है
जैसे पहेली

5
जो था अंजाना
अब वो है अपना
कैसा फसाना

6
हुई परायी
जिस घर में खेली
अम्मा की जायी

7
ले अब चली
बगियन में पी की
नाजुक कली

8
गूंजेंगे गीत
मादक मिलन से
जागेगी प्रीत

मई 01, 2013

रमिया का मंगलवार



मजदूर दिवस पर रमिया एक बार फिर.....



झोंपड़ी के टूटे टाट से
धूप की एक नन्ही किरण
तपाक से कूदी है
कच्ची अंधेरी कोठरी में
हो गई है रमिया की सुबह
दुधमुंहा बच्चा कुनमुनाया है
रमिया ने फिर उसे
थपकी देकर सुलाया है।
सूख चुका है पतीले और सीने का दूध।
रात को भरपेट नमक भात खाकर तृप्त सोए हैं
मंगलू और रज्जी।

कोने में फटे बोरे पर
कोई आदमी नुमा सोया है।
जिसके खर्राटों में भी दारू की बू है
मगर इस बार उसने
बड़ी किफ़ायत से पी है।
हफ्ते पुरानी बोतल में
नशे की आखिरी कुछ घूंट
अब भी बची है।

आज मंगलवार है,
हफ्ते भर रमिया की उंगलियों और
चाय की पत्तियों की जुगलबंदी
आज उसके आंचल में कुछ सितारे भरेगी।
जिनसे रमिया की दुनिया में
एक और हफ्ते रोशनी होगी
एक और हफ्ते बच्चों को मिलेगा
दो वक्त पेट भर खाना
एक और हफ्ते ख़ुमार में रह पाएगा
रमिया का पति

और रमिया का क्या?
एक और पैबंद की मांग करने लगी है
उसकी सात पैबंदों वाली साड़ी
अब तो सुई-धागे ने भी विद्रोह कर दिया है।
आज रमिया ने ठान ही लिया है
शाम को वह जाएगी हाट
और खरीदेगी पैंसठ वाली फूलदार साड़ी
दस के बुंदे
और एक आईना।
नदी के पानी में शक्ल देखकर
बाल संवारती रमिया
अपनी पुरानी शक्ल भूल गई है।

इतराती रमिया ने आंगन लीप डाला है
आज वह गुनगुना रही है गीत।
उसके पपड़ियाए होंठ
अचानक मुस्कुराने लगे हैं।
साबुन का एक घिसा टुकड़ा
उसने ढूंढ निकाला है।
फटी एड़ियों को रगड़ने की कोशिश में
खून निकल आया है।
लेकिन रमिया मुस्कुरा रही है।
बागान की ओर बढ़ते उसके पांवों में
जैसे पंख लगे हैं।
आज सूरज कुछ मद्धम सा है
तभी तो जेठ की धूप भी
चांदनी सी ठंडी है।

पसीने से गंधाते मजदूरों के बीच
अपनी बारी के इंतज़ार में रमिया
आज किसी और दुनिया में है।
उसकी सपनाई पलकों में चमक रहे हैं,
पीली जमीन पर नीले गुलाबी फूल
बुंदों की गुलाबी लटकन।
पैसे थामते उसके हाथ
खुशी से सिहर से गए हैं।
और वह चल पड़ी है
अपने फीके सपनों में
कुछ चटख रंग भरने।

उसके उमगते पांव
हाट में रंगबिरंगे सपनों की दुकान पर रुके हैं।
उसकी पसंदीदा साड़ी
दूसरी कतार में टंगी है।
उसने छूकर देखा है उसे, फिर सूंघकर।
नए कपड़े की महक कितनी सौंधी होती है न?
रोमांच से मुंद गई है उसकी पलकें
कितना मखमली है यह एहसास
जैसे उसके दो महीने के बेटे के गुदगुदे तलवे
और तभी उसकी आंखों के आगे अनायास उभरी हैं
घर की देहरी पर टंगी चार जोड़ी आंखें।

रमिया के लौटते कदमों में फिर पंख लगे हैं
उसे नज़र आ रहे हैं दिन भर के भूखे बच्चे
मंगलू की फटी नेकर
गुड़ियों के बदले दो महीने के बाबू को चिपकाए
सात साल की रज्जी
शराबी पति की गिड़गिड़ाती आंखें
उसने हाट से खरीदा है हफ्ते भर का राशन
थोड़ा दूध, और दारू की एक बोतल।
मगर अबकी उसका इरादा पक्का है,
अगले मंगलवार जरूर खरीदेगी रमिया
छपे फूलों वाली साड़ी और कान के बुंदे।

(बाकी जगह का मुझे पता नहीं लेकिन प.बंगाल के तराई के इलाकों में चाय बागान के मजदूरों को मंगलवार को साप्ताहिक मजदूरी दी जाती है, जो उनके लिए साप्ताहिक अवकाश भी होता है)